जनसंख्या नियंत्रण की आवश्यकता: बढ़ती जनसंख्या के दुष्परिणाम और पारंपरिक भ्रांतियाँ — डॉ. शैलेश शुक्ला

भारत आज दुनिया का सबसे अधिक जनसंख्या वाला देश बन चुका है। 2024 में भारत की जनसंख्या लगभग 145 करोड़ को पार कर गई है। यह एक ऐसी समस्या है जो देश के विकास, संसाधनों, पर्यावरण और लोगों के जीवन स्तर पर सीधा असर डालती है। सड़कों पर भीड़, अस्पतालों में लंबी कतारें, स्कूलों में जगह की कमी और बेरोजगारी - ये सब बढ़ती जनसंख्या के प्रत्यक्ष परिणाम हैं।
पर्यावरण का विनाश: ज्यादा लोग यानी ज्यादा जमीन की जरूरत, ज्यादा पानी की खपत, ज्यादा प्रदूषण और ज्यादा कचरा। जंगल काटकर बस्तियाँ बसाई जा रही हैं, नदियाँ प्रदूषित हो रही हैं, भूजल का स्तर गिर रहा है। आवास और शहरीकरण की समस्या: शहरों में जगह कम पड़ रही है। मुंबई, दिल्ली जैसे शहरों में झुग्गी-झोपड़ियों की संख्या बढ़ती जा रही है।
पारंपरिक भ्रांतियाँ और उनका खंडन: भ्रांति 1 - संतान से मोक्ष मिलता है। खंडन - भगवद्गीता में श्रीकृष्ण कहते हैं कि मोक्ष का मार्ग निष्काम कर्म और आत्मज्ञान है। भ्रांति 3 - ज्यादा बच्चे यानी बुढ़ापे का सहारा। खंडन - सच्चाई यह है कि आज के समय में ज्यादा बच्चे होने का मतलब ज्यादा सहारा नहीं, बल्कि ज्यादा खर्चा और ज्यादा चिंता है। भ्रांति 4 - संतान ईश्वर की देन है, रोकना पाप है। खंडन - ईश्वर ने इंसान को बुद्धि भी दी है; अगर हम बुद्धि का उपयोग नहीं करेंगे तो यह ईश्वर की देन का अपमान होगा।