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सामान्य · नई दिल्ली,

धार्मिक स्थलों को क्यों नहीं मिलती बंदरों से मुक्ति — अशोक मधुप

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धार्मिक स्थलों को क्यों नहीं मिलती बंदरों से मुक्ति — अशोक मधुप

धार्मिक स्थलों को बंदरों से क्यों नहीं मिलती मुक्ति। सबसे बड़ा यक्ष प्रश्न यह है कि इन स्थानों पर आने वाले श्रद्धालु कब तक इनके आतंक झेलते रहेंगे? हाल में राष्ट्रपति द्रोपदी मुर्मु अपने कार्यकाल में 19 मार्च को वृंदावन आई। वे दूसरी बार यहां आई हैं। इससे पहले इसी पद पर रहते हुए प्रणब मुखर्जी व रामनाथ कोविंद भी अपने कार्यकाल में दो बार वृंदावन आए थे।

राष्ट्रपति या कोई भी वीवीआईपी जब भी वृंदावन आता है, प्रत्येक बार उनकी सुरक्षा तो होती ही है। सबसे बड़ा काम होता है वीवीआईपी को यहां के झपटमार बदंर से बचाना। ये बंदर झपटामार कर श्रद्धालु का चश्मा उतारते और किसी ऊंची जगह पेड़ या दीवार पर जाकर बैठ जाते हैं। ये चश्मा तभी लौटाते हैं जब उन्हें खाने के लिए फ्रूटी, केला या दूसरे खाने के सामान दिए जाएं। वीवीआईपी दौरे को देखते हुए प्रशासन लंगूरों के जगह-जगह कट आउट लगवाता है।

लेखक को चित्रकूट में हनुमान गढ़ी जाने का अवसर मिला। वहां रास्ते में बंदर और लंगूर मिलते और आपके कपड़े और बैग पकड़कर रोक लेते हैं। प्रश्न है कि वीवीआईपी के आने पर ही क्यों बंदरों को रोकने की व्यवस्था होती है। देश के आम आदमी को भी वीवीआईपी क्यों नहीं समझा जाता। उसकी सुरक्षा की जिम्मेदारी भी तो सरकार की है। बंदरों की संख्या लगातार बढ़ रही है। बढ़ती बंदरों की जनसंख्या को भोजन चाहिए। भोजन के अभाव में बंदर खेतों की फसल तोड़कर खा रहे हैं, गेंहू की बाली खा जाते हैं।

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